में सुबह से अंतरराष्ट्रीय पिता दिवस के अवसर पर लोगों को देख रहा हूँ ये जितने माता ,पिता,भाई बहन दिवस पश्चिमी सभ्यता की देन हैं और बिल्कुल दिखावटी हैं।मैं इस पक्ष में नहीं हूं कि पाश्चात्य संस्कृति का अनुशरण कर मैं पिता के प्रति प्रेम को प्रदर्शित करूँ।
पर विचारधारा के स्तर पर जब "दुनियां के मजदूरों एक हो" के नारे के साथ हूं अंतरराष्ट्रीय पितृ दिवस के बहाने पिता को सम्मान देने हेतु मनाए जाने वाले फादर्स डे की भावनाओं के खिलाफ नहीं जा सकता सो 2018 में मेरा हाथ छोड़कर अनंत में विलीन हो चुके बाबू जी को सादर नमन।
वैसे जीते जी मेरे और बाबूजी(चार भाई बहनों में सिर्फ मैं ही उन्हें बाबूजी कहकर संबोधित करता हूं) के बीच पुराने प्रोटोटाइप व्यवहार रहे बाबूजी के साथ रहते हुए भी एक परहेज वाला व्यवहार,कभी उनके आमने सामने बैठ आंखों में आंखे डालकर कोई बात या बहस नहीं , उनके साथ बैठकर समाचार के अलावा TV पर कोई प्रोग्राम नहीं,किसी विषय पर मतांतर होने के बावजूद मना कर पाने का दुस्साहस नहीं कर सका।उनकी मर्जी को माना पर उन्हें उनकी मर्जी से चलने पर रोका टोका नहीं।
मेरे पढ़ाई में मुझे गणित में रुचि थी पर उनकी इच्छानुसार बायोलॉजी लिया एस्ट्रा में गणित,चेन्नई के निजी इंजीनियरिंग कॉलेज में इंजीनियरिंग में दाखिले के आफर के बावजूद उन्होंने अपने एकलौते बेटे को दक्षिण भारत भेजने से मना कर दिया।इस बात पर रंज हुई पर सामने सामने न कोई विरोध न नाराजगी और आजतक इस बात की शिकायत भी नहीं कि बाबूजी के मना करने की वजह से मैं इंजीनियर न बन सका।
उनकी प्रबल इच्छा थी कि उनकी तरह मैं भी शिक्षक बनूं पर मुझे मंजूर नहीं था,शिक्षक बनने से ना करने पर उन्होंने मेरा नामांकन नए नए खुले विश्वनाथ सिंह विधि संस्थान में करा दिया और बड़ी आशा थी कि मैं वकील बनकर उनके साथ रहूंगा।पर मैंने उनकी उस उम्मीद पर भी पानी फेरते हुए लॉ की दो पार्ट की पढ़ाई को अधूरा छोड़ व्यवसाय प्रबंधन की डिग्री लेने गृह क्षेत्र व बाबूजी के साये से दूर निकल गया।तबसे अधिकांश वक्त मैं उनसे दूर ही रहा।
उनसे परहेज जो वास्तव में संयुक्त परिवार की वजह से थी इस परहेज से हुई दूरी के कारण एक पिता के अपने पुत्र के प्रति अनुराग को मैं काफी दिनों तक नहीं समझ पाया था। इसका अहसास मुझे मेरी नौकरी में आने के बाद हुआ।मैं जहां जहां भी रहा वहां वो आते रहते थे बहाना भले ही पोते से मिलने का हो पर वास्तव में वो बेटे से मिलने आते थे।खुद कभी गेहूं के मिल पर नहीं गए,खेतों में कभी बोरा नहीं उठाया पर बेटे के लिए गेहूं का पट्टा लेकर मुंगेर से देवघर,मुजफ्फरपुर यहां तक कि मोतिहारी पहुंच जाते थे।
दरअसल वो मेरी आर्थिक आय व मेरे खर्चीले स्वभाव की वजह से वो काफी चिंतित रहा करते थे । ट्रेड यूनियन में मुझे सक्रिय देख कभी उन्होंने इसके लिये मना तो नहीं किया पर उन्हें यह चिंता अंततक सालती रही कि मैं अपनी बेटी की शादी कैसे कर पाऊंगा। उनको यह लगता था कि शायद उनका बेटा उनके जाने के बाद आर्थिक तंगी का सामना करेगा तो जितना तक सम्भव हुआ उन्होंने अपनी पोती के लिए बचत करते रहे और सच भी यही है कि आज मेरी पुत्री की शादी में उन्हीं के दिये आशीर्वाद के भरोसे हूँ।
कुछ वर्षों पहले हुए एक वाकये ने उनके मन में मेरे बिल्कुल असहाय या नकारा होने की धारणा को पूरी तरह बदल दिया।हुआ यूं कि वो मेरे साथ ही बेगूसराय में थे और मेरी अनुपस्थिति उनके सीने में दर्द हुआ और हमारे BSSRU के साथियों ने जो त्वरित सक्रियता दिखाई,मेरे पड़ोसी व यूनिट के अध्यक्ष Ranjan Choudhary उन्हें डॉक्टर के पास ले गए। Bssru Begusarai के सदस्यों गैर सदस्यों जिसे जहां पता चला कि मैं मुख्यालय में नहीं हूं और मेरे पिताजी फलाँ डॉक्टर के यहां इलाजरत है डॉक्टर की क्लिनिक पर दौड़े चले आये। कम समय में 50 से ज्यादा मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव व शुभचिंतक इकट्ठा हो गए थे।हॉस्पिटल से आने के बाद उन्हें एक बात की सन्तुष्टि हुई के मैं यानि उनका बेटा अच्छा काम कर रहा है उन्होंने जब मेरी मां को यह कहा कि 'मेरे बेटे ने पैसा भले न कमाया पर उसने आदमी कमाया है और आदमी यानी मित्र,शुभचिंतक या प्रशंसक पैसे से ज्यादा कीमती होते हैं"
बाबूजी की वह उक्ति मेरी सबसे बड़ी डिग्री ,मेरे जीवन का अबतक का सबसे बड़ा पुरस्कार और उपलब्धि है।
मेरे पिता एक शिक्षक थे उनकी मध्य विद्यालय के प्रधानाध्यापक के रूप में सीधी नियुक्ति हुई थी उसके पहले कुछ अंतराल के लिए उन्होंने बेगूसराय के मंझौल स्थित जयमंगला गढ़ उच्च विद्यालय में सहायक शिक्षक के रूप में सेवाएं दी थी।वो एक घोर कर्मठ,अनुशासित शिक्षक व कड़क प्रशासक भी थे।उनके पूरे कार्यकाल में शायद ही कोई दिन होगा जब वो समय से पहले विद्यालय नहीं पहुंचते हैं।जिस विद्यालय में रहे उसके विकास के लिए हर सम्भव प्रयास करते थे।
ऐसे बाबूजी को आज अंतरराष्ट्रीय पितृ दिवस पर याद कर सम्मानित करना तो बनता है।रंज वैसे फेकबोकियों को देख होती है जिन्होंने जीते जी पिता का सम्मान नहीं किया यहां तक कि उन्हें जीने लायक नहीं छोड़ा वैसे लोग भी फसबूक पर पिता की तस्वीर चस्पां कर फादर्स डे मना रहे हैं।कहीं तो मामला ऐसा है कि पत्नी अपने पिता को याद कर बेटी का धर्म दिखा रही है और पर पति को उसका बाप याद भी नहीं आया ।
मुझे बाबूजी ओर उनके वसूलों पर गर्व है उनका स्वभाव उनके नाम के अनुरूप था दया,समर्पण,ईमानदारी,सादगी,संयम,सदाचार ,सुचिता के सागर थे बाबूजी । इस बात का मुझे गहरा सन्तोष है कि सिर्फ मैं ही नहीं बल्कि उनकी बहू,पोते पोतियों नें भी उनके मन,सम्मान व सेवा में कोई कमी नहीं की। उनके आशीर्वाद से आज हम चारो भाई बहन व उनकी संतानें सुखपूर्वक जीवन बसर कर रहे हैं। उनको वुजरे दो वर्ष बीत गए हैं लेकिन लगता है कि बस अभी थोड़े ही दिन हुए हैं।
लोक परलोक की थ्योरी पर मेरा विश्वास है नहीं पर स्मृतिशेष बाबूजी हमेशा मेरे दिल में थे और मेरी आखिरी सांस तक दिल में रहेँगे।हालांकि आपसे किया एक आखिरी वादा आज तक पूरा न कर पाने का अफसोस है।
आज अंतरराष्ट्रीय पितृ दिवस पर उनकी विधा,उनके वसूल व सपनों को समर्पित एक मिशन की शुरुआत कर रहा हूँ।यह मिशन शिक्षा, सुचिता व जीवन मूल्यों के प्रचार प्रसार को समर्पित होगा।

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