क्या पेंडेमिक के दौरान जब आवागमन के सारे साधन बाधित हों किसी का तबादला कर देना कानून सम्मत है?
मैं सेल्स प्रोमोशन एम्प्लोयी हूं और एक ट्रेड यूनियन एक्टिविस्ट भी।हमारी जॉब को आल इंडिया नेचर का बताया जाता है।हमलोग भारत सरकार के कानून सेल्स प्रोमोशन एम्प्लाइज एक्ट 1976 के अंतर्गत निर्देशित होते हैं,यह कानून दवा उद्योग के साथ अन्य 10 उद्योगों inमें भी लागू है।हालांकि सरकार इस कानून को खत्म कर नई प्रस्तावित श्रम संहिता में विलोपित कर देना चाहती है।एक विडंबना यह भी है कि आजादी के बाद भी आजतक हमारे लिये वैधानिक कार्य नियमावली प्रकाशित नहीं हुई है।इस वजह से हमारे काम प्रबंधन की मर्जी से तय होते हैं और इस मामले में सेल्स प्रोमोशन एम्प्लोयी मुखे कानून का पालन करने के लिये मजबूर हैं।
अब रही हमारी ताजा और ज्वलंत समस्या की! हालांकि अन्य उद्योगों की तरह हमारे पेशे में भी फील्ड कामगारों को ऊपरी स्तर के प्रबंधनों द्वारा विभिन्न तरीके से प्रताड़ित किया जाता है।इन तरीकों में सबसे प्रचलित है सेल्स टारगेट करने का पूरा दवाव,अन्य प्रकार के अनैतिक व्यवसायिक प्रैक्टिस में शामिल होने का दवाब।इन सबसे कठोर तरीका है ट्रांसफर व टर्मिनेशन। सामान्य दिनों में ऐसा होना बहुत बड़ी असामान्य घटनाएं नहीं समझी जाती है।एक कर्मचारी ऐसे मौकों पर श्रम विभाग के शरण में जाता है और शिकायत दर्ज करता है यह प्रक्रिया ज्यादा देर तक चलती है। हम कम्पनियों के विरोध में आंदोलन का सहारा भी लेते हैं और जहां तहां प्रबंधन से बातचीत के जरिये मामलों को सुलटाने का प्रयास करते हैं।
अब बात पेंडेमिक, लॉक डाउन और तबादलों की,हमने पिछले वर्ष यह पाया कि सख्त लॉक डाउन के दौरान अनेक कम्पनियों के तबादले किया और उन्हें निर्दिष्ट स्थान पर एक तय सीमावधि में योगदान करने के निर्देश दिए गए।क्या लॉक डाउन के दौरान नए तबादले मानवता और कानून तथा लॉक डाउन के प्रावधानों की खिल्ली उड़ाता है।जब लॉक डाउन में रेल बन्द हो,होटल बन्द हो,सड़क यातायात पर कई तरह की पाबंदियां हो तो क्या ऐसे तबादलों को जायज मानेगें या अवैध और अमानवीय कहेंगे।
कई कम्पनी यूनियन के तमाम विरोधों व लड़ाई के बावजूद पेंडेमिक के अवसरों का इस्तेमाल करते हुए अपने कर्मियों से फील्डवर्क करने के लिये बाध्य कर रही है।ऐसा कर वो अपने ही कर्मियों की जान जोखिम में डालने का काम कर रहें हैं।ऐसे में सुदूर हिस्से में तबादले क्या वाजिब हैं।
हमारी समझ से इस पेंडेमिक में हो रहे धुंआधार तबादले, छटनी इत्यादि फैसले सिर्फ फिल्डकर्मियों को परेशान करने के लिए जा रहे हैं।कार्य बंद करने ,टर्मिनेट करने यहां तक की एक पूरी डिवीजन को बंद करने के फैसले से रातों रात सैंकड़ों लोगों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा है।इस तरह प्रधानमंत्री जी के हर वर्ष दो करोड़ नौकरों देने के वादे को धता बता रहे हैं।
छोटी कम्पनियों द्वारा अपने स्टाफ को हाफ सैलरी,सेल्स लिंक्ड सैलरी दी जा रही है तो थोड़ा जस्टिफिकेशन भी दिया जा सकता है पर बड़ी व स्थापित कम्पनियों द्वारा ऐसा करना घोर आपत्तिजनक है। कुछ वकीलों की राय मानें तो यह कानून का उल्लंघन है और इनपर आपदा नियंत्रण के कानून की अवहेलना का मुकदमा दायर करना चाहिए।
(यह लेखक के निजी विचार हैं ,लेखक एक सेल्स प्रोमोशन एम्प्लोयी व ट्रेड यूनियन एक्टिविस्ट हैं)


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