है। के नाते हमारी मालिकों से होती रहती है हालांकि
खैर हम अपने मूल टॉपिक स्वदेशी व स्वदेशी दवा कम्पनियों पर वापस लौटते हैं। पहले हम देश की घरेलू दवा कम्पनियों के उदय व उसके महानिगम बनने की कहानी को समझे। 1970 के पहले हमारे देश के दवा उद्योग पर विदेशी बहुराष्ट्रीय निगमों का लगभग एकाधिकार था।आंकड़ों की बात करें तो 1974 के पहले इन निगमों का देश के दवा व्यपार का लगभग 80 प्रतिशत पर कब्जा था। उस वक्त हमारे देश में प्रोडक्ट पेटेंट लागू था,मतलब के जिन कम्पनियों के पास किसी दवा की पेटेंट होगी वही उस दवा के निर्माण व विपणन कर सकते थे या अन्य कम्पनियों को उनकी शर्तों के अनुसार ऐसा करने की अनुमति देते थे। उस दौर में ज्यादातर भारतीय दवा कम्पनियां बड़े बहु राष्ट्रीय निगमों के लाइसेंसी या फ्रेंचाइजी मात्र थे। दवाओं के विपणन व मूल्य पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं था।
भारत सरकार द्वारा देश की जरूरत को देखते हुए भारतीय पेटेंट कानून 1970 को अस्तित्व में लाया गया।इस पेटेंट कानून को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने व्यक्तिगत समझ व दिलचस्पी लेकर लागु किया।हालांकि उस वक्त भी बहुराष्ट्रीय निगमों की लॉबी ने इंदिरा गांधी के इस कदम को रोकने की,मनमुताबिक शर्तें जोड़ने की भरपूर कोशिश की पर इंदिरा गांधी की दृढ़ता की वजह से वो असफल रहे। इस पेटेंट कानून की मुख्य विशेषता थी प्रॉसेस पेटेंट।प्रोसेस पेटेंट कानून के लागू होने से भारतीय दवा उद्योग ने अभूतपूर्व तरक्की की और 1990 आते आते न सिर्फ भारत दवा निर्माण में आत्मनिर्भर हुआ बल्कि इसने विदेशों में भी अपनी धाक जमाई।अमेरिका, इंग्लैंड, यूरोपीय देशों में भारत निर्मित जेनेरिक दवाएं निर्यात की जाने लगी और उच्च गुणवत्ता तथा कम कीमतों की वजह से लोकप्रिय भी हुई।
भारतीय पेटेंट कानून 1970 के बाद भारत में स्वदेशी कम्पनियों अभूतपूर्व विस्तार हुआ और देश में हजारों छोटी बड़ी दवा कम्पनियां स्थापित हुई। भारतीय पेटेंट कानून 1970 की बदौलत भारतीय दवा कम्पनियों ने विदेशी निगमों को पछाड़ते हुए भारत के 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्से पर कब्जा कर लिया। कम्पनियों के इस विस्तार से देश के लाखों लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नौकरियां या रोजगार उपलब्ध हुए।यह स्थिति किसी भी देश के लिए गर्व की बात थी।
1990 में देश में एक कमजोर बहुमत की सरकार थी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री थे प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डॉ मनमोहन सिंह। विश्व के उन्नत देश की लॉबी विश्वभर में डंकल प्रस्तावों के जरिये वैश्वीकरण उदारीकरण की पैरवी कर रहे थे। तत्कालीन नरसिम्हा राव की सरकार जो एक कमजोर बहुमत के सहारे बनी थी ने वर्ल्ड ट्रेड आर्गेनाईजेशन के GATT एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर कर भारत को आर्थिक उदारीकरण के रास्ते चलने का मार्ग खोल दिया।
भारत के GATT अग्रीमेंट साइन करने के बाद से भारत में सब बदलने लगा दवा उद्योग में भी यह बदलाव दिखने लगा।भारतीय अर्थ नीति में और पेटेन्ट नीति में बदलाव की आशंकाओं से घबराए भारतीय कम्पनियों में अधिग्रहण व विलय का दौर शुरू हुआ कि छोटी बड़ी कंपनियां बनी और फिर वो बड़े बहुराष्ट्रीय निगमों में समा गई। बहुराष्ट्रीय कंपनियां और बड़ी हो गयी तो कुछ भारतीय दवा कम्पनियों ने भी ने भी दूसरी भारतीय दवा कम्पनियों का अधिग्रहण किया और खुद को भारतीय बहुराष्ट्रीय निगमों के क्लब में शामिल कर लिया।
हमारी यूनियन FMRAI इन तमाम बदलावों की साक्षी रही। FMRAI ने सदस्यों के हितों की खातिर नव उदारवादी आर्थिक नीतियों और श्रम सुधारों के साथ इंडियन पेटेंट एक्ट में बदलाव का पुरजोर विरोध किया। श्रम व पूंजी के अंतर्विरोध को समझते हुये FMRAI ने मालिकों के अंदर के अंतर्विरोध को ध्यान में रखते हुए बहुराष्ट्रीय दवा कम्पनियों और स्वदेशी कम्पनियों के बीच एक लकीर खींचने की रणनीति बनाई। FMRAI ने स्वदेशी दवा कम्पनी बचाओ बहुराष्ट्रीय निगमों को भगाओ के तहत संघर्ष की रणनीति तैयार की।
FMRAI की इस रणनीति के तहत सरकार से दवा उद्योग में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर रोक लगाने, बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा स्वदेशी दवा कम्पनियों के अधिग्रहण पर रोक लगाने सम्बन्धी कानून बनाने जैसी मांगों के साथ अपना संघर्ष जारी रखा। इस रणनीति के तहत FMRAI ने अपने सदस्यों के बीच भारतीय दवा कम्पनियों के साथ नरम व सहयोगात्मक रुख अपनाने की अपील की। श्रम व पूंजी के अंतर्विरोध की सच्चाइयों को जानते समझते हुए भी FMRAI के संघर्ष की यह टैक्टिस आज भी कायम है।
March 2020 तक सबकुछ सामान्य ही था। अनेक भारतीय कम्पनियों में FMRAI की मान्यता प्राप्त यूनियन हैं उनका प्रबन्धन के साथ एक बेहतरीन तालमेल बना हुआ था। वेतन समझौते व ग्रीवांस के लिए बैठकें होती रही समझौतों व परस्पर समझदारियों के दस्तावेज साइन होते रहे। परन्तु मार्च 2020 में कोरोना महामारी की वजह से हुए अनिश्चितता व लॉक डाउन ने अचानक बड़ा बदलाव ला दिया।
मार्च 2020 के बाद अन्य उद्योगों की तरह दवा कम्पनियों के प्रबंधनों का रुख कोरोना वायरस की तरह अपने बदले रूप में आ गया। पूंजी अपने असल रूप में दिखाई देने लगी स्वदेशी विदेशी का मुखौटा एक जैसे ही लगने लगा। बल्कि इस दौर में स्वदेशी कम्पनियों की प्रबन्धन बहुराष्ट्रीय निगमों से ज्यादा आक्रामक व विकराल रुप में आ गयी।
कुछ तो अप्रैल महीने की शुरुआत में सक्रिय हो गए,वेतन भत्तों में कटौती से लेकर तबादलों,टर्मिनेशन का दौर शुरू हुआ। कुछ कम्पनियों ने तो अप्रैल में ही शायद यह जान लिया था कि Pandemic की वजह से हुई लॉक डाउन लम्बा खींचने वाली है।एक तरफ मजदूरों की नौकरियां जा रही थी तो कोरोना शायद पूंजी के पलिये एक अवसर के रूप में आई।
पूंजीपतियों के गिरोह की देश की राजधानी में हुए बैठक में इस आपदा को अवसर में इस्तेमाल की रणनीति बनी और अभी नहीं तो कभी नहीं की घोषणा की गई। प्रबंधन की किताबों में आपदा को अवसर में बदलने की बात हमने भी पढ़ी है और यह सबके लिए समान रुप में लागू होती है।
पर ये Now or Never की घोषणा किस लिए??
दरअसल Now or Never की घोषणा श्रमिकों के अधिकारों को छिनने व उनके दमन के लिए की गई है।
प्रबन्धन की इस घोषणा का असर भी साफ साफ दिखाई दे रहा है।वो यह समझते हैं कि महामारी के मद्देनजर घोषित पाबन्दियों की वजह से मजदूर एक जगह से दूसरी जगह नहीं जा सकते 100 से ज्यादा की संख्या में उपस्थित नहीं हो सकते ।उनके लोकतांत्रिक शांतिपूर्ण प्रतिरोध के अवसर भी सीमित कर दिए गए हैं इस तरह मौके का फायदा उठाकर यूनियनों को खत्म कर देने की रणनीति ही आपदा को अवसर बनाना है। और महामारी की वजह से होने वाली पाबन्दियों के बीच वो ऐसा करने में सफल हो जाएं यही है उनके Now or Never का सच।
Now or Never के नारे के पीछे श्रम कानूनों में हुए संशोधनों का लागू होने की तारीख भी उल्लेखनीय है। प्रबंधनों की यह रणनीति है कि कोरोना काल में जितनों को निपटा सके,कमजोर कर सके तो ठीक नहीं तो फिर नए श्रम कानूनों की तलवार तो उनके हाथ आनी ही है।इस पूरे दौर में एक बात जो परिलक्षित हुई वह यह के तथाकथित स्वदेशी पूंजीपतियों ने ज्यादा आक्रामकता दिखाई,उनके तेवर ज्यादा अमानवीय दिखे पर ऐसा भी नहीं कि बहुराष्ट्रीय निगमों की भूमिका पाक साफ रही ।इस तरह हम इस निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं कि भले ही हम तत्कालीन राहत के लिए देशी विदेशी का विभेद पैदा करें पूंजी का चेहरा एक जैसा ही होता है ।
कोरोना काल का सबसे दुखद अनुभव यह है कुछ कम्पनियों के साथियों ने भी अवसरवादी रवैया अपनाया। जहां हमारे पूर्ववर्ती साथियों ने संघर्ष व त्याग के बल पर यूनियन खड़ा किया , प्रबन्धन से मान्यता पाई दशकों तक सामूहिक सौदेबाजी का अधिकार स्थापित
किया उन कम्पनियों के साथियों ने पैसे के लालच में वर्षों का साथ छोड़ दिया।
परन्तु अंधेरे में रोशनी की किरण यह है कि देश के मजदूर आंदोलन ने 26 नवंबर को फिर से अपनी एकता और ताकत का अहसास करवाया।
इस आपदा में देश के किसानों का संघर्ष भी श्रमजीवियों के लिये प्रेरणादायक है। संघर्ष के ये दोनों मोर्चे हमारे आत्मविश्वास को बनाये रखने के लिए काफी हैं वैसे भी हमारे पास खोने के लिए बेड़ियां और बंदिशें हैं और पाने के लिए पूरा जहान।


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