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जाति और पार्टी का चक्रव्यूह

थोड़े दिन पहले बंगाल चुनाव कवर कर रहे एक यु ट्यूब चैनल में एक बंगाली मोशाय यह कह रहे थे कि बिहार गया जाति में और बंगाल गया पार्टी में !
वहां बैठे अन्य लोगों ने भी उनकी बातों का समर्थन किया ,मुझे भी उनकी बातों में थोड़ा दम नजर आया। यह सही है कि सामाजिक,शैक्षणिक, आर्थिक विकास के बावजूद बिहार जाति की जकड़न से बाहर नहीं निकल सका। उसी प्रकार बंगाल में जाति का प्रभाव उतना मजबूत नहीं है पर दलगत प्रतिबद्धता के मामले में बंगाल बहुत कट्टर है। बिहार के चुनाव में जाति और बंगाल के चुनाव में पार्टी से अलग होकर कुछ सोचना भी बेकार है।
जाति और पार्टी में विभाजित बिहार और बंगाल की त्रासदी इसलिये भी अन्य पिछड़े राज्यों से ज्यादा है।बंगाल में 36 वर्ष वाम फ्रंट सत्ता में रही और बिहार आज़ादी के बाद से आजतक हर चुनाव में जाति के आधार पर दलों को चुनता रहा है।बीच के एक दो मौकों 1977 या उससे पहले बिहार में हुए समाजवादियों के उभार में कुछ बदलाव जरूर दिखे पर जातीय प्रतिबद्धता बिल्कुल खत्म हो गयी ऐसा नहीं कह सकते।

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