बिहार के लोगों को बिहारी कहे जाने पर बुरा क्यों लगता है ?
यह प्रश्न अब उतना प्रसांगिक नहीं रहा क्योंकि बिहारियों की मानसिकता में पहले की अपेक्षा बहुत बदलाव आया है।
दरअसल इस प्रश्न का सामना प्रवासी बिहारियों को ज्यादा करना पड़ता है।तीन दशक पहले तक बिहार से बाहर जाने वालों में मजदूर वर्ग के लोग ज्यादा थे लेकिन बाद के दिनों में छोटे किसान परिवारों से भी लोगों का पलायन हुआ।लालू राबड़ी के शासन काल में जब यहां की शासन व्यवस्था बिगड़ी,शिक्षण संस्थाओं की हालत बदतर हुई,सरकारी नौकरियों में पक्षपात पूर्ण बहांलियां होने लगी तो राज्य के सम्पन्न व प्रभुत्वशाली वर्ग का भी पलायन शुरू हुआ।
सरकारी नौकरी खासकर रेलवे, बैंक,एलआईसी,केंद्रीय सेवाओं में बिहारियों की संख्या बढ़ने लगी।बिहार के लोग अब सिर्फ ठेले वाले,रेहड़ी वाले,टैक्सी या ऑटो रिक्शा चालक ही नहीं बल्कि लोको पायलट,विमान पायलट, जिला मजिस्ट्रेट, पुलिस कप्तान,स्टेशन मास्टर आदि के रूप में भी पदस्थापित होने लगे। साधन सम्पन्न बिहारियों ने दिल्ली,कलकत्ता, मुंबई जैसे महानगरों में निवेश भी किया और विभिन्न व्यवसाय में अपनी धाक जमाई।
महानगरों में पलायन कर गए प्रवासियों की दूसरी पीढ़ी ने भी अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी और विभिन्न क्षेत्रों में अलग पहचान बनाई तो हीन भावना में कमी आई।स्थानीय लोगों ने बिहारियों की प्रतिभा का लोहा मानना शुरू कर दिया।
अतः अब ऐसे प्रश्न उतने प्रासंगिक नहीं रहे जितनी तीन दशक पहले थी।महानगरों में गए प्रवासियों ने महानगरों को ही अपना स्थायी ठिकाना बना लिया ।आज कोलकाता, दिल्ली,मुंबई आदि में बिहारी मतदाताओं की बड़ी तादात है और कई विधानसभा, लोकसभा में बिहारियों का मत निर्णायक है उस नाते स्थानीय राजनीतिक दल और उनके नेता बिहारियों को उचित सम्मान देने लगे हैं।बढ़ती हुई संख्या ने बिहारियों का मनोबल बढ़ाया है तो न इन्हें कोई बिहारी कहकर अपमानित करने की सोचता है न बिहारी कहलाये जाने पर इन्हें कोई फर्क पड़ता है।


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